माँ का दिल

एक बच्चा संसार में आता है
करोड़ों बुराई पाकर डर जाता है
डर कर बच्चा जोर से चिल्लाता है
चीख सुन माँ सहम जाती है
पल भर सीने से लगा छुपाती है
भुख में बच्चा फिर रोता है
माँ को पल में समझ आ जाता है
जिस दुनिया के लिए पल्लू नहीं सरका,
बच्चे की खातिर, पूरा स्तन निर्वस्त्र हो जाता है
तब पहला दूध पी पाता है
घुटरुन चलता माँ की सीने पे,
लोट लगाता हाथो में, हर अंग हाथो से सजाती है
कमर पकढ़ चलना सिखाती,
हाथ पकढ़ खाना सिखाती,
कलम पकढ़ लिखना सिखाती है
एक-एक जूठी हरकत में, लड़ कर पापा से बचाती है
छोटी सी बीमारी पे, रात भर जाग आँसू बहाती है
खुद तिल-तिल कर मर कर,
बच्चे को इन्सान बनती है
खुद भूखी हो कर भी उसको पहले खिलाती है
चाहे वो कितना भी तंग करे,
ख़ुशी-ख़ुशी हँसके सब सह जाती है
फिर तू मुर्ख ह्रदय हीनं इन्सान,
देवी को छोड़ बाहर चला जाता है
बीवी में हो मस्त, माँ को भूल जाता है
गलती से भी कोई सूचना छोटी सी छींक की भी,
माँ को मिल जाती है
तड़प उठता है दिल आत्मा दुखी हो जाती है
फिर भी माँ की याद में, कोई औलाद वापस नहीं आती है
माँ ने बच्चे को जोड़ा, याद में खुद टूटती चली जाती है

1 टिप्पणी:

  1. bahut achhi kavita hai. Esey padkar mujhe bhee ek bahut purani kavita ki do lines yaad aa gaeen:-
    Maan se ladkar,
    bachcha ghar se bhaag gaya,
    Andhere main chalte chalte,
    uska paer pathar se takraya,
    gir padaa aur maan ki awaaj aaei,
    Beta sambhlo, kahin chot to nahin aaei

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